@आज भी याद आते हैं रामभक्त ‘कल्याण ….. ★पुण्य स्मरण…. ★रिपोर्ट (हर्षवर्धन पाण्डे)” स्टार खबर” नैनीताल…

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@आज भी याद आते हैं रामभक्त ‘कल्याण …..

★पुण्य स्मरण….

★रिपोर्ट (हर्षवर्धन पाण्डे)” स्टार खबर” नैनीताल…

कल्याण सिंह का जन्म यूपी के अलीगढ़ जिले में अतरौली तहसील के मढ़ोली गांव में 5 जनवरी, 1932 में हुआ था । वहीं से राजनीति की शुरुआत कर लखनऊ, दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तक राजनीति में ऊंचा कद प्राप्त किया। एक जमाने में हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम से जाने वाले कल्याण सिंह की राम जन्मभूमि आंदोलन में अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। सभी लोग कल्याण सिंह को ‘बाबूजी’ कहकर बुलाते थे। उनकी सादगी और ईमानदारी के सभी लोग कायल थे। जब भी लोग उनसे मुलाकात करते और कोई राय लेते तो वह उनका मार्गदर्शन करते थे । वे हमेशा उनसे कहते थे कि सफलता के लिए धैर्य का होना बहुत जरूरी है। कल्याण सिंह की पूरी राजनीती में इस धैर्य की छाप देखी जा सकती है। उनके मुख्यमंत्री रहते हुए 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरी थी और इस मामले में उन्हें एक दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा था। भाजपा के सबसे पहले और सबसे सशक्त ओबीसी नेताओं में कल्याण सिंह का नाम आता है। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में 1990 में जब मंडल-कमंडल की राजनीति शुरू हुई तब ही बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण आंदोलन को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर हाथ में लिया। देश में राजनीति दो हिस्सों में बंट गई। एक तरफ मंडल की राजनीति करने वाले और दूसरे मंदिर की राजनीति के साथ,लेकिन कल्याण सिंह देश के शायद इकलौते राजनेता होगें जिन्होंने दोनों राजनीति एक साथ की। बीजेपी में सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने वाले नेताओं में कल्याण सिंह का नाम सबसे ऊपर गिना जाता है। पिछड़ों और दलितों की आवाज उठाने के साथ कल्याण सिंह ने राम मंदिर आंदोलन में परोक्ष और अपरोक्ष रूप से बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। कल्याण सिंह श्रीराम मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेतृत्वकर्ताओं में थे। उन्होंने कहा था कि, ‘प्रभु श्रीराम में मुझे अगाध श्रद्धा है। अब मुझे जीवन में कुछ और नहीं चाहिए। राम जन्मभूमि पर मंदिर बनता हुआ देखने की इच्छा थी, जो अब पूरी हो गई। सत्ता तो छोटी चीज है, आती-जाती रहती है। मुझे सरकार जाने का न तब दुख था, न अब है। मैंने सरकार की परवाह कभी नहीं की। मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलाऊंगा। अन्य जो भी उपाय हों, उन उपायों से स्थिति को नियंत्रण में किया जाए।’

कल्याण सिंह आठ बार विधायक भी रहे, दो बार यूपी के मुख्यमंत्री,एक बार लोकसभा सांसद और फिर राजस्थान के साथ हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल की भूमिका का भी निर्वहन किया। मुख्यमंत्री के तौर पर यूपी में नकल रोकने के लिए कड़ा कानून बनाया और नाराजगी झेलनी पड़ी। उस वक्त शिक्षा मंत्री थे राजनाथ सिंह।1991 में बीजेपी को यूपी में 425 में से 221 सीटें मिली थी । शपथ लेने के बाद पूरे मंत्रिमंडल के साथ पहुंचे अयोध्या और शपथ ली कसम राम की खाते हैं, मंदिर यहीं बनाएंगें ।अगले ही साल कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी और कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। तब के प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने शाम को उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। फिर 1993 में जब चुनाव हुए तो बीजेपी की सीटें तो घट गईं, लेकिन वोट बढ़ गए। बीजेपी की सरकार नहीं बन पाई। साल 1995 में बीजेपी और बीएसपी ने मिलकर सरकार तो बनाई,लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। बाद में बीजेपी ने हाथ खींच कर सरकार गिरा दी। एक साल तक राष्ट्रपति शासन रहा। 17 अक्टूबर 1996 को जब 13वीं विधानसभा बनी तो लेकिन किसी को बहुमत नहीं मिला, बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन सीटें 173 मिली जिससे सरकार नहीं बन सकती थी। समाजवादी पार्टी को 108, बीएसपी को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिली । तब के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने की सिफारिश कर दी । एक साल से पहले ही राष्ट्रपति शासन चल रहा था । सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए केन्द्र के राष्ट्रपति शासन को बढ़ाने के निर्णय को मंजूरी दे दी। लेकिन 1997 में हिन्दुस्तान की राजनीति में नया प्रयोग हुआ अगड़ों और पिछड़ों की पार्टी ने 6-6 महीने सीएम रहने के लिए हाथ मिला लिए।

अटल बिहारी वाजपेयी और कांशीराम के बीच हुए इस समझौते के बाद मायावती पहले छह महीने के लिए मुख्यमंत्री बनी थी, लेकिन छह महीने बाद जब कल्याण सिंह का नंबर आया तो एक महीने बाद ही बीएसपी ने समर्थन वापस ले लिया,इस कहानी के बाद क्या हुआ सब जानते हैं कि किस तरह कल्याण सिंह ने कांग्रेस और बीएसपी को तोड़कर अपनी सरकार बचा ली। वाजपेयी और बीजेपी से रिश्तों में खटास आने के बाद से कल्याण सिंह को हटाने की मांग होने लगी और 12 नवम्बर 1999 को कल्याण सिंह का इस्तीफा हो गया और रामप्रकाश गुप्त को सीएम बनाया गया। नाराजगी इस कदर बढ़ गई कि पार्टी ने पहले सस्पेंड किया और फिर 09 दिसम्बर 1999 को उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया।

कल्याण सिंह ने नई पार्टी बना ली लेकिन साल 2002 के चुनाव में उन्हें सिर्फ़ चार सीटें मिली। अगस्त 2003 में यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकार में कल्याण सिंह की पार्टी शामिल हो गई। साल 2004 के चुनाव में कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी ने चुनाव लड़ा ,लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, पार्टी तीसरे नंबर रही फिर दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। साल 2009 का लोकसभा चुनाव कल्याण सिंह ने एसपी के समर्थन से लड़ा और लोकसभा पहुंचे,लेकिन मुलायम सिंह को नुकसान हुआ, दोनों नेताओं के बीच दोस्ती खत्म हो गई। कल्याण सिंह फिर से अपनी पार्टी को मजबूत करने लगे ,साल 2012 में यूपी में उन्होंनें बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा ,लेकिन उनकी पार्टी हार गई और बीजेपी भी।

साल 2014 में जब बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी आए तो कल्याण सिंह की एक बार फिर बीजेपी में वापसी हो गई। इस बार उन्होंने कसम खाई कि ‘ज़िंदगी की आखिरी सांस तक अब बीजेपी का रहूंगा’। कल्याण सिंह को राज्यपाल बना कर राजस्थान भेज दिया गया। जयपुर राजभवन में भी उनका मन लखनऊ की राजनीति में लगा रहा। राजभवन के बाद वे फिर से यूपी की राजनीति में सक्रिय हो गए।राजनीति में शुचिता बरकरार रखने के लिये कठिन फैसले लेने में तनिक भी देर नहीं करने वाले कल्याण सिंह ने अपने मुख्यमंंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश में पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन कर राज्य में कानून व्यवस्था के खिलाफ खिलवाड़ करने वालों को सख्त संदेश दिया था। वर्ष 1991 में प्रदेश में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कल्याण सिंह ने अपने करीब डेढ़ वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल में 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया था। अपने दूसरे कार्यकाल में श्री सिंह ने 21 सितम्बर 1997 को शपथ ग्रहण करने के बाद चार मई 1998 को एसटीएफ का गठन कराया और उसे पहला टास्क आतंक का पर्याय बने गोरखपुर के दुर्दांत माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत को खत्म करने का दिया था। इस निर्णय की परिणाम जल्द सामने आया जब 22 सितंबर 1998 में गाजियाबाद में एसटीएफ ने एक मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को मार गिराया। नब्बे के दशक में श्रीप्रकाश का आतंक यूपी के अलावा पड़ोसी राज्य बिहार में भी था। इसके बाद एसटीएफ ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और एक के बाद एक कई माफियाओं और दुर्दांत अपराधियों को मुठभेड़ में ढेर कर प्रदेश में शांति का माहौल बनाने में अहम योगदान दिया। यह मुहिम आज भी जारी है जिसे यूपी के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है।

21 अगस्त 2021 में कल्याण सिंह ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भाजपा अभी से मिशन लोकसभा 2024 की मुनादी में जुटी है। दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही जाता है और प्रदेश के लगभग 25 जिलों की 75 सीटों पर लोधी बिरादरी का प्रभाव माना जाता है। आज दूसरी पुण्य तिथि पर यूपी में बड़े आयोजन के बहाने भाजपा कल्याण को याद कर एक बार फिर से पिछ्ड़े वर्ग के बड़े वोट बैंक को अपने साथ जोड़े रखना चाहती है। मुरादाबाद मंडल की मुरादाबाद , नगीना , बिजनौर , रामपुर , अमरोहा, संभाल ऐसी सीटें हैं जिनमें भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। यहां लोध वोट की हार जीत में बड़ी भूमिका है । इसे कल्याण सिंह के आसरे साधकर भाजपा 2024 में खुद को इन सीटों पर मजबूत करना चाह रही है। आज कल्याण सिंह की दूसरी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि देने के लिए अलीगढ़ में केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के दिग्गज जुटे हैं। उनकी जन्म और कर्म भूमि अतरौली समेत अलीगढ़, लखनऊ में कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह भले ही अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन दलित पिछड़ों की राजनीति से लेकर राम मंदिर आंदोलन में अहम योगदान देने के कारण वह खासकर भाजपा के नेताओं और कार्यकतार्ओं के दिलों में सदियों तक जीवित रहेंगे।