खतड़ुवा पर्व ने दी सर्दियों के स्वागत की दस्तक, पशुधन की सुख-समृद्धि की कामना… अश्विन संक्रांति पर कुमाऊं में मनाया गया लोकपर्व, गोठ की सफाई कर जलाया खतड़ुवा; बच्चों ने लगाए पारंपरिक जयकारे… विशेष- (राजीव पांडे ) खीमदा “स्टार खबर” नैनीताल..

25

नैनीताल। अश्विन संक्रांति के साथ ही कुमाऊं में पारंपरिक खतड़ुवा पर्व मनाया गया। सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाने वाला यह लोकपर्व कुमाऊं की लोकसंस्कृति, पशुधन और बदलते मौसम से जुड़ी पुरानी परंपराओं का प्रतीक है। हर वर्ष अश्विन मास की संक्रांति यानी एक गते को मनाए जाने वाले इस पर्व को सर्दियों के आगमन की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है।
खतड़ुवा पर्व मुख्य रूप से पशुधन को समर्पित माना जाता है। पर्व के दिन ग्रामीण क्षेत्रों में गाय-बैलों के गोठ की साफ-सफाई की जाती है। शाम को गोठ में मसाल (मशाल) बनाकर उसे घुमाया जाता है और प्रतीकात्मक रूप से खतड़ुवा जलाया जाता है। इस दौरान ककड़ी काटने की भी परंपरा है। माना जाता है कि इससे पशुधन की रक्षा और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

●बच्चों की टोली लगाती है पारंपरिक जयकारे..

शाम होते ही बच्चे और ग्रामीण खतड़ुवा जलाने के लिए एकत्र होते हैं। ककड़ी काटने और खतड़ुवा जलाने के दौरान पारंपरिक लोकपंक्ति “भेल्लो खतड़ुवा धार-धार, गाय की जीत खतड़ुवे की हार” का उद्घोष किया जाता है। लोकमान्यता में यह गायों की सुरक्षा और बुराइयों पर विजय का प्रतीक माना जाता है।

●कुमाऊंनी विजय की स्मृति से भी जोड़ी जाती है परंपरा..

डीडी शर्मा की पुस्तक उत्तराखंड ज्ञानकोष में खतड़ुवा पर्व की एक लोकमान्यता का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार इसे कुमाऊंनी सेना की गढ़वाल सेना पर विजय की स्मृति से भी जोड़ा जाता है। लोककथा के अनुसार युद्ध में कुमाऊंनी सेना का नेतृत्व गैड़ा सिंह और गढ़वाली सेना का नेतृत्व खतड़ं सिंह ने किया था। युद्ध में खतड़ं सिंह की पराजय के बाद इस विजय की स्मृति में खतड़ुवा मनाए जाने की मान्यता बताई जाती है।
हालांकि, खतड़ुवा पर्व से जुड़ी ऐतिहासिक कथा के अलग-अलग लोकवर्णन भी मिलते हैं। पर्व की सबसे प्रमुख पहचान आज भी पशुधन की सुरक्षा, गोठ की स्वच्छता और मौसम परिवर्तन के स्वागत से जुड़ी लोकपरंपरा है।