नैनीताल। एक व्यक्ति पर अपने भाई, भाभी और मां की हत्या का आरोप था। मामले में सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि, आरोपी की मानसिक स्थिति और मुकदमे के दौरान अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। अदालत ने पूर्व में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को निरस्त कर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेज दिया था। पुनः सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने एक बार फिर मृत्युदंड सुनाया।
मामले की हालिया सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने आरोपी की मानसिक बीमारी को घटना का महत्वपूर्ण आधार मानते हुए उसे सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया। साथ ही सरकार को आरोपी का मानसिक उपचार कराने के निर्देश दिए हैं।
मामले में न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) के रूप में पैरवी करने वाले अधिवक्ता के अनुसार, आरोपी को पहली बार रिमांड पर पेश किए जाने के दौरान उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं पाई गई थी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी उसकी मानसिक स्थिति का सवाल महत्वपूर्ण रहा। अधिवक्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का उचित पालन नहीं किया गया था। इसके बाद मृत्युदंड का आदेश निरस्त कर मामला पुनः सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेजा गया था।
अधिवक्ता के अनुसार, उच्च न्यायालय ने घटना के पीछे मानसिक बीमारी से जुड़े तर्क को स्वीकार करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम की धारा 103 के तहत आरोपी के उपचार की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए हैं। आरोपी की मानसिक स्थिति में सुधार होने के बाद नियमानुसार उचित निर्णय लेने की बात कही गई है।
इस फैसले में आरोपी की मानसिक स्थिति, आपराधिक न्याय प्रक्रिया और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े पहलुओं को महत्वपूर्ण माना गया है।







