हाई कोर्ट शिफ्टिंग पर घमासान, अधिवक्ताओं ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल.. ‘मोनेटाइजेशन’ के नाम पर हाई कोर्ट की संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का आरोप, वन भूमि हस्तांतरण में केंद्रीय अनुमति को बताया अनिवार्य… रिपोर्ट- (सुनील भारती ) “स्टार खबर” नैनीताल..

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नैनीताल। हाई कोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी के गौलापार में स्थानांतरित करने की कवायद को लेकर विरोध के स्वर एक बार फिर तेज हो गए हैं। अधिवक्ता एमसी पंत ने सरकार की प्रक्रिया और 12 अगस्त के शासनादेश को लेकर कई कानूनी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार की ओर से अदालत में इसे अभी प्रक्रिया बताया गया, जबकि शासनादेश में जमीन और संपत्ति के हस्तांतरण तथा उसके ‘मोनेटाइजेशन’ की बात सामने आती है।

ऐसे में दोनों पक्षों के रुख में विरोधाभास दिखाई देता है।अधिवक्ता के अनुसार, याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि उसके पास हाई कोर्ट स्थानांतरण का कोई प्रस्ताव नहीं है, जबकि राज्य सरकार ने भी प्रस्ताव भेजे जाने से इनकार किया था। इसके बावजूद 12 अगस्त के शासनादेश में जिस तरह की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, उससे कई सवाल पैदा होते हैं।उन्होंने वन भूमि से जुड़े प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि वन भूमि के हस्तांतरण के लिए केंद्रीय सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक है। उनका दावा है कि इस मामले में अभी तक ऐसी पूर्व अनुमति की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। इसी मामले में अधिवक्ता कौशल शाह जगाती की शिकायत पर केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने तीन सितंबर को राज्य सरकार को वन संरक्षण कानून से जुड़े आरोपों की विस्तृत जांच कर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
अधिवक्ता ने हाथी कॉरिडोर से जुड़े सरकारी दावे पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि राज्य सरकार की ओर से हाई कोर्ट में क्षेत्र को हाथी कॉरिडोर नहीं होने की बात कही गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में हाथी कॉरिडोर का नए सिरे से सर्वे कराने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में इस दावे का आधार भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट की संपत्तियों के ‘मोनेटाइजेशन’ का उद्देश्य भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि क्या उत्तराखंड की महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्थाओं की संपत्तियों को धन अर्जित करने के उद्देश्य से हस्तांतरित किया जा रहा है।

‘कानूनी पहलुओं पर नहीं हुआ विचार’

अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता ने कहा कि याचिका को प्रीमेच्योर मानकर खारिज किया गया, लेकिन याचिका में उठाए गए कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ।

उनके अनुसार, वन संरक्षण अधिनियम की धारा-2 के उल्लंघन का आरोप भी इसी विवाद का अहम हिस्सा है। उनका कहना है कि धारा-2 के तहत केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना वन भूमि के संबंध में इस तरह की कार्रवाई पर कानूनी रोक है। मामले को आगे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है।

‘सरकार संस्थाओं को बेचने पर तुली’

अधिवक्ता डॉ महेंद्र सिंह पाल ने सरकार पर सार्वजनिक संस्थानों की संपत्तियों को व्यावसायिक नजरिये से देखने का आरोप लगाया।

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उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट उत्तराखंड की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक है और इसके स्थानांतरण तथा संपत्तियों के मोनेटाइजेशन की प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच गंभीर चिंता है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर आंदोलन को फिर तेज किया जाएगा।