राष्ट्रपति भवन में दिखेगी उत्तराखंड की लोककला ऐपण की छटा… राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेंट की ऐपण से तैयार लक्ष्मी चौकी… रिपोर्ट- (सुनील भारती ) “स्टार खबर” नैनीताल..

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नैनीताल। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोककला ऐपण अब देश की ऐतिहासिक धरोहर राष्ट्रपति भवन में अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा की छटा बिखेरेगी। राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित आर्टिस्ट इन रेजिडेंस कार्यक्रम में नैनीताल की राष्ट्रीय पुरस्कार एवं उत्तराखंड शिल्प रत्न से सम्मानित ऐपण कलाकार मंजू रौतेला और हल्द्वानी की हेमलता कबडवाल ने उत्तराखंड की लोककला का प्रतिनिधित्व कर प्रदेश को गौरवान्वित किया।राष्ट्रपति सचिवालय के कला एवं संग्रहालय अनुभाग की ओर से 22 अक्टूबर से छह नवंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में देश के छह राज्यों से चयनित लोककला के जानकार कलाकारों ने प्रतिभाग किया। ‘विकसित भारत-2047’ की थीम पर आधारित कार्यक्रम में कलाकारों को अपनी-अपनी लोककलाओं के माध्यम से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विकास की परिकल्पना को कैनवास पर उकेरना था। इसके लिए विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कलाओं और चित्रांकन शैलियों को एक साझा मंच प्रदान किया गया।इस आयोजन में मंजू रौतेला और हेमलता कबडवाल ने टीम के रूप में उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। दोनों कलाकारों ने अपनी कलाकृति के माध्यम से कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान और लोकपरंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया।
इस अवसर पर मंजू रौतेला ने ऐपण कला से स्वयं तैयार की गई लक्ष्मी चौकी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को भेंट की। राष्ट्रपति ने कलाकारों से उनकी कलाकृतियों और ऐपण कला की विशेषताओं के संबंध में संवाद किया। साथ ही कलाकारों को राष्ट्रपति भवन की ओर से स्मृति चिह्न और अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।मंजू रौतेला ने इस आयोजन के लिए राष्ट्रपति सचिवालय की सचिव आईएएस दीप्ति उमाशंकर, राष्ट्रपति भवन के डिप्टी डायरेक्टर पंकज प्रवीण बदलोई, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, राष्ट्रपति भवन से जुड़ी स्वाति शाही, क्यूरेटर कोमल पांडेय तथा आईजीएनसीए की डॉ. ऋचा कंबोज और श्रद्धा त्रिवेदी गजबर का आभार जताया।उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन जैसे प्रतिष्ठित मंच पर उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को प्रस्तुत करना गौरव का विषय है। इससे प्रदेश की लोककला को राष्ट्रीय पहचान मिलने के साथ ही नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी।