नैनीताल ने खोया पहाड़ की आवाज बुलंद करने वाला अपना नेता… डॉ. नारायण सिंह जंतवाल का पार्थिव शरीर पहुंचा नैनी विहार.. रिपोर्ट- (ब्यूरो) “स्टार खबर” नैनीताल..

34

नैनीताल। पूर्व विधायक एवं उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख संघर्षशील नेताओं में शुमार डॉ. नारायण सिंह जंतवाल के आकस्मिक निधन से नैनीताल सहित पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर है। शनिवार को उनका पार्थिव शरीर नैनीताल स्थित उनके आवास नैनी विहार पहुंचा। यहां अंतिम दर्शन के लिए परिचितों, शुभचिंतकों और स्थानीय लोगों का पहुंचना शुरू हुआ। उनके पार्थिव शरीर को देखकर परिजन और शुभचिंतक भावुक हो उठे। अंतिम दर्शन के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव ले जाया जाएगा, जहां रविवार को रानीबाग में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

डॉ. जंतवाल के निधन को शहर और प्रदेश के राजनीतिक, सामाजिक तथा बौद्धिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके साथ लंबे समय तक जुड़े रहे लोगों ने उन्हें एक संवेदनशील, सरल, ईमानदार और पहाड़ के सवालों पर बेबाकी से अपनी बात रखने वाला जननेता बताया।

●पहाड़ के सवालों को विधानसभा में मजबूती से उठाया : प्रो. शेखर पाठक..

इतिहासकार एवं प्रोफेसर शेखर पाठक ने डॉ. जंतवाल के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। वर्ष 2002 से 2007 तक नैनीताल के विधायक रहते हुए उन्होंने विधानसभा में पहाड़ और आम जनता से जुड़े मुद्दों को बेहद सक्रियता और तथ्यात्मक तरीके से उठाया। वे अत्यंत संवेदनशील और मददगार व्यक्ति थे। कठिन से कठिन विषय पर भी बिना उत्तेजित हुए संतुलित और विवेकपूर्ण ढंग से अपनी बात रखते थे। पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं, जमीनों, पर्यटन, प्राकृतिक आपदाओं, जंगलों की आग और अंकिता भंडारी जैसे संवेदनशील मामलों पर भी वे लगातार मुखर रहे। प्रो. पाठक ने उनके निधन को समाज की बड़ी क्षति बताते हुए पत्नी सावित्री और बच्चों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

●छात्र राजनीति से राज्य आंदोलन तक रहा संघर्षपूर्ण सफर : प्रो. ललित तिवारी..

 

कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ललित तिवारी ने कहा कि डॉ. जंतवाल का सार्वजनिक जीवन छात्र राजनीति से ही संघर्ष और जनसेवा को समर्पित रहा। डीएसबी परिसर में उन्होंने संयुक्त सचिव, सचिव और छात्रसंघ अध्यक्ष जैसे दायित्व निभाए। इसके बाद उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने उत्तराखंड की भूमि, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए कई आंदोलनों में भागीदारी की। तिवारी ने कहा कि डॉ. जंतवाल की छवि एक ईमानदार, सिद्धांतवादी और मिलनसार नेता की थी। विधायक रहते हुए उन्होंने नैनीताल के विभिन्न क्षेत्रों में विकास कार्य कराए और सड़कों सहित बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में योगदान दिया। उन्होंने बताया कि कुछ समय से अस्वस्थ होने के बावजूद डॉ. जंतवाल हाल के दिनों में सक्रिय थे। नंदा देवी डोला भ्रमण में उन्होंने पैदल यात्रा भी की थी। ऐसे में उनके निधन की सूचना ने सभी को स्तब्ध कर दिया है।

●66 वर्ष की उम्र में उनका जाना बड़ी क्षति : राजीव लोचन साह..

 

वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह ने डॉ. जंतवाल के निधन को उत्तराखंड राज्य आंदोलन और पूरे समाज के लिए बड़ी क्षति बताया। उन्होंने कहा कि 66 वर्ष की उम्र कोई दुनिया छोड़ने की उम्र नहीं होती। इस उम्र में व्यक्ति राजनीतिक और सामाजिक रूप से अधिक परिपक्व होता है। डॉ. जंतवाल अभी प्रदेश के लिए बहुत कुछ कर सकते थे और हाल के दिनों में लगातार सक्रिय भी हो रहे थे।
साह ने उनके छात्र जीवन के संघर्ष को याद करते हुए बताया कि 28 नवंबर 1977 को हुए नैनीताल क्लब कांड और वन आंदोलन के दौरान डॉ. जंतवाल सीआरएसटी इंटर कॉलेज में कक्षा 11 के छात्र थे। इतनी कम उम्र में ही उन्होंने विद्यार्थियों का नेतृत्व किया था। उन्होंने कहा कि डॉ. जंतवाल में प्रभावशाली वक्तृत्व कला के साथ अद्भुत विनम्रता थी। वह अपने व्यवहार से हर व्यक्ति को अपना बना लेते थे। विधायक रहते हुए उनके द्वारा कराए गए विकास कार्यों को आज भी जनता याद करती है।
उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में माल रोड पर मुलाकातों और विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति से वह पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय दिखाई देते थे। उनके निधन से राज्य आंदोलनकारियों और उत्तराखंड के जनसरोकारों से जुड़े लोगों ने एक मजबूत साथी खो दिया है।
डॉ. जंतवाल का राजनीतिक जीवन केवल विधायक के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल के माध्यम से भी राज्य की अस्मिता, गैरसैंण राजधानी, जल-जंगल-जमीन और पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाया। उनके निधन से नैनीताल के सार्वजनिक जीवन में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।