लो आ गई होली..उत्तराखण्ड के कुमाऊँ में सजने लगी बैठकी होली की महफिलें…

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आज सरोवर नगरी में पौष के पहले रविवार से शुरु हो गई बैठकी होली की महफिलें..तीन महीनों तक रहेगी बहार…

 

पहाड़ ना सिर्फ कुदरती खुबसूरती का खजाना है बल्कि यहां लोक परम्परा और सांस्कृतिक विरासत भी बहुत मजबूत रही है।हालांकि देश में होली को अभी बहुत समय है लेकिन कुमाऊँ में होली की महफिलें पौष के प्रथम रविवार से ही सजने लगती हैं। जो कि तीन महीनों तक भक्ति की बयार से श्रृंगार रस तक चलती रहेगी।आज श्री रामसेवक सभागार में बैठकी होली का शुभारंभ विधिवत हो गया।पूर्व विधायक डॉ0 नारायण सिंह जंतवाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। संस्था के महासचिव जगदीश बावड़ी ने सभी का स्वागत किया तथा अध्यक्षता मनोज साह तथा संचालन प्रो0ललित तिवारी ने किया।

देवभूमि में..लो आ गई होली…

आज सरोवर नगरी में भी पौष के पहले रविवार को बैठकी होली की महफिलें सजनी शुरू हो गई। अब तीन महीनों तक होल्यार ऐसे ही मस्ती के रंगों में रंगे नजर आएंगे।सबसे विशेष है कि युवा नये होल्यार हार्मोनियम की धुन और तबले की थाप पर सुरो का ऐसा संगीत दे रहे हैं। कि बड़े और पूराने होल्यार भी इनके रागों में जोड़ लगाने को मजबूर हैं। नैनीताल के युवा होल्यार विरेन्द्र खालसा कहते हैं कि युवाओं को अधिक संख्या में आगे आने की जरुरत है। क्योकिं आज इंटरनेट और मोबाइल के साथ टीवी पर ही युवा व्यस्त हैं। अगर वो संगीत व अपनी संस्कृति को जानेंगे तो प्रदेश, राष्ट्रहित हित में रहेगा। वहीं संगीतप्रेमी व रंगकर्मी होल्यार मिथिलेश पाण्डे कहते हैं कि कुमाऊँ में होली का इतिहास दो सौ से तीन सौ साल पुराना है। और अल्मोड़ा के हुक्का क्लब का योगदान इस होली गायन की परम्परा को और आगे बढाने वाला है।मिथिलेश कहते हैं कि दशहरे के बाद होली का इंतजार रहता है और कुमाऊँ की ये गौरवशाली परम्परा है कि तीन महिनों तक होली यहां खेली जाती है जिसमें तीन रुप मिलते हैं बैठकी, खड़ी और महिला होली..जो वक्त के साथ बदलते रहते हैं। लेकिन शिवरात्रि के बाद ये चरम पर रहेगी और छलड़ी के बाद खत्म होगी।

ये है पहाड़ में होली की इतिहास…

दरअसल उत्तराखंड के कुमाऊँ परिक्षेत्र में होली का इतिहास बहुत पुराना रहा है। शास्त्रीय संगीत पर पर आधारीत होने के साथ कुमाऊँनी अवधी व बृजभाषा में यहाँ होली गायी जाती रही है। 16 मात्राओं में होने वाली इस होली में राग झिंझोरी,राग धमाल, जंगलाकाफी, जैजवंती,खमार, राग दरबारी, के अलावा इसमें अन्य गायन पक्ष भी मजबूत रहा है। जानकार ये बताते हैं कि पहाड़ों में होली गायन अमीर खुसरो के वक्त से आज तक ये अपनी पहचान को कायम रखे हुए हैं। हांलाकि युवाओं का जोश भी परम्परा के लिये एक वरदान साबित हो रहा है। नैनीताल में होली आयोजन कर रही संस्था श्री राम सेवक सभा के महासचिव जगदीश बवाड़ी कहते हैं कि उनका मकसद सिर्फ पहाड़ की लोक परम्पराओं को आगे बढाना है।और आज युवा भी इससे जुड़ रहे हैं अभी ये भक्ति रस से शुरु हुई होली आगे बसंत से श्रृंगार रस में रंगने लगेगी तो शिवरात्रि के बाद ये पूरे शबाब पर होगी हांलाकि टीके पर इसका पूर्णतःसमापन हो जाएगा।

संगीत प्रेमी व भद्रजनों की बड़ी संख्या में रही उपस्थित…

आज होली के इस शुभारंभ कार्यक्रम में सतीश पांडे ,नरेश चमियाल ,राजा साह ,मिथिलेश पांडे ,मनोज पांडे , नरेंद्र बिष्ट , अजय कुमार ,रक्षित साह ,बीरेंद्र , पारस जोशी ,वंश जोशी ने होली के धूम प्रारंभ की। नवीन बेगाना तथा गिरीश भट्ट सहित अशोक साह ,राजेंद्र बिष्ट , मुकेश जोशी ,बिमल साह राजेंद्र लाल साह ,हरीश राणा , ,डॉक्टर मनोज बिष्ट गुड्डू ,कुंदन नेगी ,एडवोकेट मनोज साह ,अमर साह ,रोहित हीरा सिंह ,नीरज बिष्ट आदि अनेक लोगों ने सहभागिता की।