उत्तराखंड अधिवक्ता संयुक्त मोर्चा ने मुख्यमंत्री को भेजा पत्र…….हाई कोर्ट शिफ्ट को लेकर कहा अगर करेंगे ऐसा तो पहाड़ की अवधारणा क्या…7 एकड़ इस जमीन को हाई कोर्ट को देने की उठायी मांग…

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नैनीताल – उत्तराखंड हाई कोर्ट को नैनीताल से शिफ्ट नहीं करने के लिए हाई कोर्ट के वकीलों ने मुख्यमंत्री की ज्ञापन दिया है। उत्तराखंड अधिवक्ता संयुक्त मोर्चा ने मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में हाई कोर्ट को पहाड़ से शिफ्ट नहीं करने की मांग की है। उत्तराखंड संयुक्त मोर्चा ने कहा है कि तराई में पलायन हो रहा है और पहाड़ खाली हो रहे हैं लेकिन पहाड़ विरोधी लोग जमीन बेचने के लिए सक्रिय हैं। वकीलों ने कहा है कि 1 हजार गावँ भुतहा हो गए हैं जमीन बंजर हो रही है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि 2008 में250 वकीलों को चैंबर मिलव हैं और 250 के लिए और चैंबर लगभग तैयार हो गए हैं। इसके साथ कहा है कि 7 एकड़ जमीन मेट्रोपोल की हाई कोर्ट को दी जाए।

ये लिखा है पत्र में...

सेवामे,
श्रीमान माननीय मुख्यमंत्री
महोदय उत्तराखंड सरकार
बिषय – उत्तराखंड के पहाड़ी जिलो से
बढ़ते पलायन की समस्या के
सम्बन्ध मे
महोदय,
उत्तराखंड अपनी बिशेष सांस्कृतिक,राजनैतिक,भौगोलिक विरासत व जनआंदोलनो व जनता की शहादत से बना राज्य है राज्य का गठन पहाड़ से पलायन रोकने व बिशेष रूप से पहाड़ के विकास के लिए किया गया, अलग पहाड़ी राज्य की मांग 1897 से शुरू हुई और 9 नवंबर 2000 को यहा की जनता को एक अलग राज्य मिला, पलायन रोकने के लिए सरकार द्वारा धरातल पर कोई ठोस कदम नही उठाए गये,उत्तराखंड बनने के बाद पहाड़ के लगभग 1000 गांव निर्जन हो चुके है वही उत्तराखंड के मैदानी श्रेत्र मे औद्योगिकीकरण व शहरीकरण से 20% खेती की जमीन समाप्त हो चुकी है,औद्योगिक विकास भी केवल उत्तराखंड के मैदानी श्रेत्रो मे ही हुआ,उत्तराखंड बनने के बाद पहाड़ी जिलो से लगभग 32 लाख लोग पलायन कर चुके है पहाड़ मे न उद्योग लग सके और न ही वहा राज्य स्तरीय व केन्द्रीय संस्थान खोले गये उसके उलट कई राजकीय संस्थान पहाड़ से मैदान मे शिफ्ट कर दिये गये.
नैनीताल जो कि उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी है सन 1815 मे अंग्रेजो ने कुमाऊँ व गढ़वाल को जोड़कर कुमाऊँ कमिश्नरी की स्थापना की और उत्तराखंड के सभी न्यायिक व प्रशासनिक कार्य नैनीताल से ही किये जाने लगे और सन 1862 से नैनीताल को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त की राजधानी भी बना दिया गया नैनीताल का इतिहास पर्यटन से अधिक न्यायिक व प्रशासनिक है इसलिए उत्तराखंड की स्थापना के समय ही नैनीताल मे उत्तराखंड की स्थाई हाईकोर्ट की स्थापना की गई उसके बाद नैनीताल से 12 की मी की दूरी पर भवाली मे उत्तराखंड ज्यूडिशियल अकादमी की स्थापना की गई,भवाली मे नेशनल ला कालेज की स्थापना का भी प्रस्ताव था लेकिन उसका रूख भी देहरादून की ओर मोड़ दिया ,आज नैनीताल हाईकोर्ट मे रेगुलर वकालत करने वाले अधिवक्ताओ की संख्या लगभग 700 है जिसमे उत्तराखंड के सभी जिलो से आने वाले 500 अधिवक्ता स्थाई रूप से नैनीताल मे रह है नैनीताल मे उत्तराखंड का उच्च न्यायालय होने से नैनीताल वासियो व आसपास के गांवो के लगभग 10 हजार लोगो को रोजगार मिला हुआ है लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट की स्थापना के 22 साल बाद कुछ लोग नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्टिंग की बात कर रहे है जब नैनीताल मे लगभग 250 अधिवक्ताओ को 2008 मे चैम्बर मिल चुके और लगभग 250 अधिवक्ताओ के लिए चैम्बर निर्माण का कार्य पूर्ण होने को है पिछल 22 सालो मे नैनीताल हाईकोर्ट पर जनता का लगभग ₹8000 करोड़ खर्च हो चुका है भविष्य के लिए हाईकोर्ट को अधिक जमीन की आवश्यकता है तो हाईकोर्ट के नजदीक मैट्रोपोल होटल की लगभग 7 एकड़ जमीन खाली पड़ी है जिसको सरकार हाईकोर्ट को मुहैया कर सकती है

उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना करने वाले नेता,जनता व अलग उत्तराखंड राज्य के लिए अपनी शहादत देने वाले शहीदो ने कभी नही सोचा होगा कि आज उत्तराखंड मे नेता-अधिकारी-माफिया एक संगठित गिरोह की तरह काम करेंगे, पहाड़ी जिलो मे बेरोजगारी,शिक्षा व स्वास्थ्य की समस्या बढ़ते जा रही है
वैसे पलायन को और अच्छी भाषा मे शिफ्टिंग भी कहा जा सकता है पहाड़ से तराई-भावर व देहरादून मे शिफ्टिंग….

17-09-2017 को पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी ने पलायन आयोग का गठन किया लेकिन आयोग की कार्यप्रणाली कारगर साबित नही हो पाई .
महोदय आपने पहाड़ के विकास व पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग को पलायन निवारण आयोग बनाकर पहाड़ के गांव-गांव मे विकास व सार्वजनिक सुविधाओ को बढ़ाने का संकल्प लिया है
महोदय से हाईकोर्ट नैनीताल मे वकालत कर रहे अधिवक्ताओ व पहाड़ की जनता आपसे आग्रह है कि आप उत्तराखंड से पलायन/शिफ्टिंग रोकने व उत्तराखंड राज्य के निर्माण मे शहादत देने वाले शहीदो के स्वप्नो का उत्तराखंड बनाने के लिए बचन बद्ध होगें