एक राष्ट्र–एक चुनाव नीतिगत विमर्श पर शैक्षिक वेबिनार… वन नेशन, वन इलेक्शन” भारतीय राजनीति के जटिल परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण एवं दूरगामी प्रस्ताव… रिपोर्ट- (सुनील भारती ) “स्टार खबर” नैनीताल..

29

नैनीताल। एक राष्ट्र–एक चुनाव: नीतिगत विमर्श पर शैक्षिक वेबिनार”, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल द्वारा आयोजित
विज़िटिंग प्रोफेसर निदेशालय एवं भौतिक शिक्षा विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल के संयुक्त संरक्षण में “वन नेशन, वन इलेक्शन: पालिसी फिजिबिलिटी इन लाइट ऑफ़ गवर्नमेंट्स रीसेंट रेकमेंडेशन्स” विषय पर 15 नवंबर 2025 को एक वेबिनार का सफल आयोजन किया गया।
भौतिक शिक्षा विभाग के नोडल हेड डॉ. संतोष कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया तथा प्रोफ़ेसर नीता बोरा ने सभी प्रतिभागियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए “वन नेशन, वन इलेक्शन” विषय की प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रणाली के क्या संभावित सकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
इस वेबिनार के मुख्य वक्ता वरिष्ठ प्रोफ़ेसर एम. एम. सेमवाल थे, जो राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष तथा डॉ. अम्बेडकर सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस, एच.एन.बी. गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड के समन्वयक हैं।
प्रोफ़ेसर सेमवाल ने विषय से संबंधित महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत एवं उपयोगी जानकारी प्रदान की।
“वन नेशन, वन इलेक्शन” भारतीय राजनीति के जटिल परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण एवं दूरगामी प्रस्ताव है। भारत में समानांतर चुनाव कोई नई अवधारणा नहीं है; 1967 तक यह एक सामान्य प्रथा थी। किंतु 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं तथा दिसंबर 1970 में लोकसभा के भंग होने के पश्चात्, संसद और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराए जाने लगे। स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक 68 चरणों में आयोजित हुए, जो लगभग 100 दिनों तक चले। 1957 में 76% राज्यों में और 1962 व 1967 में 67% राज्यों में समानांतर चुनाव संपन्न हुए।
वक्ता ने निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जनता को सहजता और पारदर्शिता के साथ अपने प्रतिनिधियों का चयन करने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि यूके, स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका में चुनाव किस प्रकार और किस अंतराल पर आयोजित किए जाते हैं।
उन्होंने “वन नेशन, वन इलेक्शन” के अनेक फायदों पर प्रकाश डाला—जैसे कि न्यूनतम हॉर्स-ट्रेडिंग, सुरक्षा बलों की कम तैनाती, लोकलुभावन घोषणाओं में कमी, राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार, नीतिगत निरंतरता, विकास गतिविधियों में गति, और जीडीपी पर सकारात्मक प्रभाव। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार चुनाव होने से सामाजिक तानाबाना प्रभावित होता है, विद्यालय और महाविद्यालयीन शिक्षक चुनावी प्रक्रिया में लग जाते हैं जिससे सरकारी कामकाज प्रभावित होता है, और बार-बार मतदान होने से मतदाता भागीदारी में भी गिरावट आती है। वर्तमान में लोकसभा चुनावों में लगभग 67% मतदान होता है और एक साथ चुनाव होने पर यह प्रतिशत और बढ़ने की संभावना है।
उन्होंने आगे बताया कि “वन नेशन, वन इलेक्शन” को लागू करने में कई बड़ी व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आएँगी—विशेषकर लॉजिस्टिक प्रबंधन, एक साथ विशाल स्तर पर मतदान की व्यवस्था और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता। उन्होंने उल्लेख किया कि पूरे देश में एकसाथ चुनाव कराने के लिए लगभग 30 लाख EVM और VVPAT मशीनों की आवश्यकता होगी, जो एक अत्यंत बड़ा तकनीकी और वित्तीय निवेश है। ये सभी कारक इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले गहन विश्लेषण और दूरदर्शी योजना की मांग करते हैं। उन्होंने विधि आयोग की रिपोर्ट, आवश्यक संवैधानिक संशोधनों तथा अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि संसद, राज्य विधानसभाओं, नगरीय निकायों और पंचायतों के चुनावों को एकसाथ कराने के लिए व्यापक संशोधनों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक होगा। चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती सभी चुनाव प्रक्रियाओं को एक ही समय-सीमा में समन्वित करना है। इसके साथ ही संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दे तथा व्यवहारिक (feasibility) चुनौतियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिनके समाधान के बिना इस प्रणाली को लागू करना कठिन होगा।
अंत में उन्होंने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की कि किसी भी परिवर्तन को बिना विवाद और विरोध के लागू करना संभव नहीं होता, क्योंकि यह मानव स्वभाव का हिस्सा है। फिर भी, इस प्रणाली के अनेक लाभ, चुनौतियाँ और सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, और इसी कारण इसे लागू करने की दिशा में गंभीर एवं ठोस पहल की जानी चाहिए।
वेबिनार में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की। प्रमुख प्रतिभागियों में डॉ. उमराव सिंह, प्रोफ़ेसर गीता तिवारी, डॉ. हेमचंद्र पांडे, डॉ. इन्द्रेश के. पांडे, डॉ. मनस्वी सेमवाल, डॉ. मंजु त्रिवेदी, डॉ. प्रकाश कुमार सिंह, डॉ. ऋचा शर्मा, तथा डॉ. किरण तिवारी सहित अनेक छात्र-छात्राएँ, संकाय सदस्य एवं शोधार्थी सम्मिलित रहे।
प्रस्तुति के दौरान प्रतिभागियों द्वारा अनेक प्रश्न पूछे गए, जिनका प्रोफ़ेसर सेमवाल ने धैर्यपूर्वक और विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए विषय के विभिन्न पहलुओं को और अधिक स्पष्ट किया।
कार्यक्रम का कुशल संचालन विज़िटिंग प्रोफेसर निदेशालय के निदेशक प्रो ललित तिवारी द्वारा किया गया। उन्होंने मुख्य वक्ता का औपचारिक परिचय प्रस्तुत किया तथा अंत में सभी प्रतिभागियों, वक्ताओं और आयोजन टीम को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।
वेबिनार सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और प्रतिभागियों ने इसे अत्यंत ज्ञानवर्धक, समसामयिक एवं नीति-निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।