हरेला : हरियाली, पर्यावरण संरक्षण और हिमालयी संस्कृति का लोकपर्व… प्रकृति के प्रति समर्पण, सतत विकास और सामाजिक समरसता का संदेश देता है हरेला… विशेष- प्रोफेसर ललित तिवारी…

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नैनीताल। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति में हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और कृषि के प्रति आस्था, समर्पण एवं सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह लोकपर्व हरियाली के आगमन, मानसून की शुरुआत और धरती की उर्वरता का उत्सव है। हरेला लोगों को प्रकृति से जुड़ने, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य बनाने की प्रेरणा देता है।
‘हरेला’ का शाब्दिक अर्थ ‘हरियाली’ या ‘हरे रंग का दिन’ है। यह पर्व अच्छी फसल, पर्यावरण संरक्षण तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। उत्तराखंड में हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। पहला चैत्र मास में, दूसरा श्रावण मास में तथा तीसरा आश्विन मास में। इनमें श्रावण मास का हरेला सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
चैत्र का हरेला गर्मी के आगमन, श्रावण का हरेला वर्षा ऋतु के स्वागत और आश्विन का हरेला शीत ऋतु के आगमन का संकेत देता है। इस प्रकार हरेला ऋतु परिवर्तन का भी प्रतीक है।श्रावण मास के हरेले की शुरुआत सावन लगने से नौ दिन पहले होती है। इस अवसर पर जौ, गेहूं, धान, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, सरसों आदि पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। दसवें दिन, अर्थात सावन के प्रथम दिन, हरेला काटकर घरों में पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद कुलदेवता को अर्पित कर परिवार के बुजुर्ग बच्चों और परिजनों के सिर पर हरेला रखकर दीर्घायु, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
लोकमान्यता है कि सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी कारण यह पर्व शिव-पार्वती की आराधना से भी जुड़ा हुआ है। एक प्राचीन कथा के अनुसार, जब भयंकर सूखे से धरती त्रस्त थी, तब लोगों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिव की कृपा से वर्षा हुई और धरती फिर से हरी-भरी हो गई। तभी से हरियाली के इस प्रतीक को ‘हरेला’ के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।
हरेला के अवसर पर लोग मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की प्रतिमाएं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर उनकी पूजा करते हैं और अच्छी फसल, समय पर वर्षा तथा खुशहाली की कामना करते हैं।
आज जब जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण असंतुलन पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुके हैं, तब हरेला का महत्व और बढ़ जाता है। यह पर्व वृक्षारोपण, जल संरक्षण, मिट्टी के कटाव को रोकने और जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देता है। पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।उत्तराखंड सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा हरेला पर्व के अवसर पर व्यापक स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। खेतों, बगीचों, विद्यालयों और वन क्षेत्रों में पौधे लगाकर हरित उत्तराखंड का संकल्प दोहराया जाता है।
हरेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उत्सव है। यह हमें संदेश देता है कि “यदि प्रकृति स्वस्थ है, तो मानव जीवन भी स्वस्थ और सुरक्षित रहेगा।”
हरेला के अवसर पर बुजुर्गों द्वारा दिया जाने वाला पारंपरिक आशीर्वाद आज भी लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर है—
“जी रया, जागि रया।
दुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो।
स्यालक जस वन त्राण हैजो।
हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”
अर्थात— दीर्घायु रहो, सदैव जागरूक रहो, दूब की तरह मजबूत जड़ें हों, पत्तों की तरह निरंतर बढ़ते रहो, वन्यजीवों जैसी शक्ति प्राप्त हो और जब तक हिमालय में बर्फ तथा गंगा में जल रहेगा, तब तक हरेला का यह पावन पर्व यूँ ही मनाया जाता रहे।