गिर्दा को नमन: मालरोड पर गूंजे जनगीत, रंगकर्मियों ने निकाली रैली… रिपोर्ट- (सुनील भारती) “स्टार खबर ” नैनीताल…

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नैनीताल। उत्तराखंड के जनकवि, गीतकार और रंगकर्मी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को नैनीताल में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। नगर के रंगकर्मियों ने रैली निकालकर गिर्दा की स्मृतियों को याद किया। रैली के दौरान मालरोड उनके जनगीतों और रचनाओं से गूंज उठी।

गिर्दा ने अपनी कविताओं, गीतों और रंगमंच के माध्यम से पहाड़ के जनजीवन, जल-जंगल-जमीन, पलायन और सामाजिक सरोकारों को आवाज दी। उनकी रचनाएं आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना और जनआंदोलनों की पहचान बनी हुई हैं।
गिर्दा की पत्नी हेमलता तिवारी ने भावुक होकर कहा कि आज बेरोजगारी, शिक्षा और आपदा जैसी समस्याओं के बीच गिर्दा की कमी बेहद महसूस होती है। उन्हें विश्वास था कि यदि गिर्दा आज होते तो इन समस्याओं के समाधान का कोई न कोई रास्ता जरूर निकालते। उन्हें आने वाली पीढ़ी पर पूरा भरोसा था और उम्मीद थी कि युवा उनके विचारों और जनसरोकारों को आगे बढ़ाएंगे।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड आंदोलन में गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके जनगीतों ने आंदोलनकारियों में ऊर्जा और संघर्ष का जज्बा पैदा किया। गिर्दा की यादों को साझा करते हुए उन्होंने उनकी कविता की पंक्तियां भी याद कीं—“वो कल के गीत तुम्हें हैं समर्पित… इन आंखों को तुम पूरा करोगे, गीत से आगे का गीत रचोगे।” उन्होंने कहा कि गिर्दा की यादें आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं और उनके गीत नई पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे।
रंगकर्मी बलबीर सिंह चीमा ने कहा कि गिर्दा की कमी आज भी गहराई से महसूस होती है, लेकिन उनकी कविताएं और जनगीत उन्हें हमेशा जीवित रखते हैं। उन्होंने गिर्दा को केवल कवि नहीं, बल्कि जनगायक, नाटककार, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी और निर्देशक जैसी बहुआयामी प्रतिभा का धनी बताया।

चीमा ने कहा कि गिर्दा की रचनाएं, खासकर “जैता एक दिन तो हाल होगी दुनिया में”, उम्मीद और संघर्ष का संदेश देती हैं और आज भी जनता के बीच जीवित हैं। उन्होंने याद किया कि गिर्दा ने उनकी प्रसिद्ध गजल “ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के” को सबसे पहले धुन दी थी, जो बाद में देशभर में गाई गई।
उन्होंने कहा कि गिर्दा, नरेंद्र सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा और अन्य जनकवियों की रचनाएं उत्तराखंड की जनचेतना की अमूल्य धरोहर हैं। गिर्दा जिस जनपक्षधर और बेहतर उत्तराखंड का सपना देखते थे, उसे साकार करने के लिए संघर्ष और प्रयास लगातार जारी रहेंगे। उनके अनुसार, गिर्दा भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविता, आवाज और विचार हमेशा लोगों के साथ रहेंगे।
गिर्दा उत्तराखंड के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से गहराई से जुड़े रहे। वन आंदोलनों से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक उनके गीतों और कविताओं ने लोगों में जागरूकता और संघर्ष की भावना पैदा की। उनके कई जनगीत आज भी आंदोलनकारी चेतना का हिस्सा हैं।
‘आज हिमाले तुमन कै धत्यूँछो’, ‘जैंता एक दिन तो आलो’ और ‘हम लड़ते रया भुला’ जैसी रचनाओं ने पहाड़ के लोगों के सवालों और संघर्षों को स्वर दिया। उनके गीतों में पहाड़ की प्रकृति के साथ-साथ आम आदमी की पीड़ा और व्यवस्था से जुड़े सवाल भी प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
गिर्दा की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहज और जनभाषा रही। उन्होंने कठिन साहित्यिक शब्दावली के बजाय आम बोलचाल की भाषा में पहाड़ के जीवन, संघर्ष और समस्याओं को अभिव्यक्ति दी। यही वजह रही कि उनकी रचनाएं किताबों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि गांव-गांव और आंदोलनों के बीच लोगों की जुबान का हिस्सा बन गईं।
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का जन्म अल्मोड़ा जिले के ज्योली गांव में हुआ था। कविता, गीत, रंगमंच और जनसरोकार उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे। 22 अगस्त 2010 को उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएं उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।
आज जब पहाड़ में पलायन, पर्यावरण, जल-जंगल-जमीन और ग्रामीण जीवन से जुड़े सवाल चर्चा में हैं, गिर्दा के गीत नई पीढ़ी को भी इन मुद्दों पर सोचने और सवाल उठाने की प्रेरणा देते हैं।