पितृ पक्ष आज से शुरू, तर्पण के साथ पौधारोपण और गो-ग्रास का भी विधान.. 16 दिनों तक पितरों के स्मरण के साथ सेवा, संयम और सात्विक आचरण पर जोर; श्राद्ध भोज के दौरान मौन रहने की परंपरा.. विशेष- (राजीव पांडे ) खीमदा “स्टार खबर” नैनीताल..

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नैनीताल। पितरों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का पितृ पक्ष रविवार से आरंभ हो रहा है। इस अवधि में तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के साथ ही सेवा, संयम और प्रकृति संरक्षण से जुड़े कार्य करने की भी परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण और दान आदि कर्म पितरों को समर्पित किए जाते हैं।

 

●दक्षिण दिशा की ओर मुख कर करें तर्पण..

पितृ पक्ष के 16 दिनों में प्रतिदिन एक पात्र में जल लेकर उसमें एक चुटकी तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जा सकता है। तर्पण का जल किसी पौधे अथवा गमले में अर्पित करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक आस्था के अनुसार तर्पण करते समय हाथ को उचित मुद्रा में रखते हुए जल अर्पित किया जाता है। तर्पण का जल नाली में बहाने के बजाय किसी पौधे में डालने की बात कही गई है।पितृ पक्ष में पितरों की स्मृति में पौधारोपण करने को भी पुण्यकारी माना गया है। इस दौरान एक या अधिक पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल करने का संकल्प लिया जा सकता है। इससे श्रद्धा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलता है।

●जलचर जीवों के लिए भी अर्पित करें आहार..

पितृ पक्ष के दौरान किसी एक दिन एक पात्र में दूध, थोड़ी जौ और तिल मिलाकर उसे नदी में अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता के अनुसार इससे जल में रहने वाले छोटे जीवों को आहार मिल सकता है। हालांकि नदी की स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक जलस्रोतों में कोई ऐसी सामग्री न डालें जिससे प्रदूषण हो।

●श्राद्ध भोज में मौन और सात्विकता पर जोर..

श्राद्ध के भोजन के दौरान मौन रहने की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी गई है। भोजन करते समय उसके स्वाद, अधिक अच्छा या स्वादिष्ट होने जैसी बातचीत से बचने और शांत चित्त से भोजन करने की बात कही गई है। श्राद्धकर्ता और श्राद्ध भोज ग्रहण करने वाले व्यक्ति दोनों के लिए संयमित एवं शांत भाव रखने को आवश्यक माना गया है। भोजन मांगने के लिए भी संकेत से बताने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

●तर्पण में देव, ऋषि और पितरों का स्मरण.

परंपरा के अनुसार तर्पण क्रम में पहले देव तर्पण, इसके बाद ऋषि तर्पण, सप्तर्षि तर्पण, 14 यमों का तर्पण और अंत में सर्वपितृ तर्पण किया जाता है। इसके साथ ही घर में नियमित रूप से स्वच्छता रखने, देहरी लीपने और गो-ग्रास देने जैसी परंपराओं का भी उल्लेख किया गया है।

धार्मिक भाव का मंत्र

“देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्युत॥”

ॐ श्री पितृदेवाय नमः।