★. ‘फ्री कंबल’ के लालच में जिंदगी दांव पर: अवैध आयोजन में दीवार गिरी, 6 घायल — आयोजक शीलू कुमार पर मुकदमा ★. क्या ‘सेवा’ की आड़ में हो रही थीं सस्ती लोकप्रियता की कोशिश? (चन्दन सिंह बिष्ट) “स्टार खबर”  

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★. ‘फ्री कंबल’ के लालच में जिंदगी दांव पर: अवैध आयोजन में दीवार गिरी, 6 घायल — आयोजक शीलू कुमार पर मुकदमा

★. क्या ‘सेवा’ की आड़ में हो रही थीं सस्ती लोकप्रियता की कोशिश?

(चन्दन सिंह बिष्ट) “स्टार खबर”

बेतालघाट (नैनीताल)

मिनी स्टेडियम में कंबल वितरण के नाम पर किया गया कथित जनकल्याण कार्यक्रम असल में आयोजकों की घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी का शर्मनाक नमूना निकला। बिना किसी प्रशासनिक अनुमति, बिना सुरक्षा इंतजाम और बिना भीड़ प्रबंधन के जुटाई गई हजारों की भीड़ ने छह लोगों की जान खतरे में डाल दी। (स्टार खबर) से बात की तो आयोजित कर्ता ने कहा कि प्रशासन से अनुमति ली गई है। लेकिन आयोजन कर्ता से जब (स्टार खबर) ने बात की तो (स्टार खबर) को भी अनुमति की कॉपी व्हाट्सएप नहीं कर सके ।

सोमवार देर शाम बेतालघाट स्थित मिनी स्टेडियम में “आरम्भ विधानसभा 2027” कार्यक्रम के दौरान “फ्री कंबल” के लालच में 2000 से ज्यादा लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। न बैरिकेडिंग थी, न सुरक्षा कर्मी और न ही कोई आपात योजना। हालात इतने बेकाबू हुए कि भीड़ दीवार पर चढ़ गई और भार न सह पाने से दीवार ढह गई। हादसे में तीन महिलाएं और तीन पुरुष गंभीर रूप से घायल हो गए।

घायलों में कांति देवी (65), रेखा देवी (43), बचुली देवी (58), भोपाल अधिकारी (17), मोहन कुमार (37) और रेवाधर (38) शामिल हैं। चार घायलों की हालत गंभीर होने पर उन्हें सीएचसी से हल्द्वानी रेफर किया गया।

★ . प्रशासन की अनुमति तक नहीं ली गई

जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने साफ किया कि इस आयोजन के लिए न तो जिला प्रशासन से अनुमति ली गई थी और न ही पुलिस से। यानी सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और आपात प्रबंधन — तीनों मोर्चों पर नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं।

मंगलवार को क्षेत्रीय युवा कल्याण अधिकारी कुंदन कुमार की तहरीर पर आयोजक शीलू कुमार, तारा भंडारी समेत अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

★. हादसे के बाद भी संवेदनहीनता

लापरवाही यहीं नहीं रुकी। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने आयोजकों की असंवेदनशीलता की एक और परत उधेड़ दी। आरोप है कि सुबह कार्यक्रम में लाने के लिए वाहन लगाए गए, लेकिन रात में लौटने की कोई व्यवस्था नहीं की गई। महिलाएं मजबूरी में घने जंगलों से, वन्यजीवों के डर के बीच पैदल घर लौटती दिखीं।

★. क्या ‘सेवा’ की आड़ में हो रही थीं सस्ती लोकप्रियता की कोशिश?

वहीं कुछ लोगों का कहना था कि यह आयोजन सेवा कम और सस्ती लोकप्रियता बटोरने का तमाशा ज्यादा नजर आया। बिना तैयारी भीड़ जुटाना, सुरक्षा को नजरअंदाज करना और हादसे के बाद भी बुनियादी इंतजाम न करना — ये सब बताता है कि आयोजकों के लिए लोगों की जान की कीमत शून्य थी।

★. सवाल प्रशासन और आयोजकों से

प्रशासन भले ही भविष्य में सख्त दिशा-निर्देश लागू करने की बात कर रहा हो, लेकिन सवाल यह है — क्या प्रचार की होड़ में आयोजकों को आम जनता की जान से खेलने की खुली छूट मिलती रहेगी? ऐसे गैर-जिम्मेदार आयोजकों पर सख्त कार्रवाई ही भविष्य में ऐसी घटनाओं पर लगाम लगा सकती है।