नैनीताल। भारतीय कालगणना की समृद्ध परंपरा में विक्रम संवत का विशेष महत्व है। विक्रम संवत का नववर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस) से प्रारंभ होता है। यह दिन वसंत ऋतु, प्रकृति के नवचक्र, सृष्टि की रचना तथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के राज्याभिषेक से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगादी, नवरेह, चेटीचंड और सज्बू चेयरबा जैसे नामों से मनाया जाता है।
प्रकृति और नवजीवन का प्रतीक
विक्रम संवत का नववर्ष प्रकृति में ऋतु परिवर्तन के समय आता है। वसंत ऋतु में पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं, खेतों में फसलें तैयार होती हैं और वातावरण सुहावना हो जाता है। यह समय प्रकृति में नवजीवन और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण यह पर्व खगोलीय गणना (सूर्य और चंद्रमा की स्थिति) पर आधारित भारतीय पंचांग के अनुसार मनाया जाता है।
पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी और इसी दिन सतयुग का आरंभ भी माना जाता है। इस महत्व के कारण उज्जैन के सम्राट महाराज विक्रमादित्य ने भी अपने संवत्सर का आरंभ इसी दिन से माना। कहा जाता है कि उन्होंने 57 ईसा पूर्व (57 BCE) में शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में विक्रम संवत की स्थापना की।
नव वर्ष 2083 की विशेषताएं
19 मार्च 2026 से नव विक्रमी संवत 2083 का शुभारंभ होगा। इस संवत का नाम “रौद्र” होगा।
इस वर्ष का आरंभ उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, शुक्ल योग और मीन लग्न में होगा।
पंचांग के अनुसार नव संवत के राजा और मंत्री का निर्धारण वार के आधार पर किया जाता है।
इस बार नववर्ष का आरंभ गुरुवार से होने के कारण राजा – गुरु (बृहस्पति) होंगे।
मंत्री – मंगल होंगे।
धार्मिक परंपरा और मंत्र
नव संवत्सर के अवसर पर देवी उपासना का विशेष महत्व है। इस दिन से चैत्र नवरात्रि भी आरंभ होती है। इस अवसर पर यह मंत्र जप शुभ माना गया है—
“ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवधात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥”
स्वास्थ्य और परंपरा
नववर्ष के पहले दिन नीम के पत्तों और मिश्री को मिलाकर खाने की परंपरा है। इसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है तथा यह जीवन में सुख-दुख दोनों को समान भाव से स्वीकार करने का प्रतीक भी है।
विक्रम संवत और शक संवत
विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलता है और यह चंद्र-सौर पंचांग पर आधारित है।
दूसरी ओर शक संवत की शुरुआत 78 ईस्वी में मानी जाती है, जिसे भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर माना गया है और इसे 1957 में आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इसकी शुरुआत कुषाण शासक कनिष्क के राज्याभिषेक से जुड़ी मानी जाती है, हालांकि कुछ मान्यताएं इसे शालिवाहन से भी जोड़ती हैं।
युगाब्द (कलियुगाब्द) का महत्व
भारतीय कालगणना में युगाब्द का भी विशेष महत्व है।
“युग” = कालखंड
“अब्द” = वर्ष
अर्थात युग की शुरुआत से बीते वर्षों की गणना। पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण के बैकुंठ गमन (लगभग 3102 ईसा पूर्व) से कलियुग का आरंभ माना जाता है।
वर्ष 2026 में युगाब्द 5128 चल रहा है, जिसकी गणना भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ मानी जाती है।
भारतीय संस्कृति का प्रतीक
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से ही गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र), उगादी (दक्षिण भारत), नवरेह (कश्मीर), चेटीचंड (सिंधी समाज) और अन्य पारंपरिक पर्व भी मनाए जाते हैं। यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है।
शुभकामनाएं
19 मार्च 2026 से आरंभ होने वाला नव विक्रमी संवत 2083 सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और नई ऊर्जा लेकर आए — यही मंगलकामना है।
नव संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं।







