नैनीताल। उत्तराखंड के पहाड़ों में मनाई जाने वाली घ्यू संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती-बाड़ी, पशुधन और लोकपरंपराओं के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। भाद्रपद मास की संक्रांति पर मनाए जाने वाले इस पर्व पर पहाड़ में घर-घर विशेष पकवान बनाए जाते हैं और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।बारिश के मौसम में पहाड़ की धरती हरियाली से भर उठती है। खेतों में नई फसल की कलियां फूटने लगती हैं और पशुधन से भी पर्याप्त दूध मिलने लगता है। पुराने समय में दूध की अधिकता के कारण उससे घी तैयार किया जाता था। घी को पौष्टिक आहार मानते हुए इस दिन बच्चों और परिवार के सदस्यों को विशेष रूप से खिलाया जाता था।
लोकमान्यता में घ्यू संक्रांति को लेकर एक रोचक परंपरा भी रही है। कहा जाता था कि यदि कोई व्यक्ति इस दिन घी का सेवन नहीं करता है तो अगले जन्म में उसे गनेल यानी घोंघा बनना पड़ेगा। इसी लोकविश्वास के चलते लोग इस दिन घी का सेवन जरूर करते थे।
घ्यू संक्रांति पर पहाड़ी घरों में उड़द की दाल के बड़, कचौड़ी और बेड़ू रोट जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। वहीं खेतों और घरों में उगने वाली सब्जियों व साग—जैसे खीरा, तुरई और अन्य स्थानीय साग—को पहले भगवान को अर्पित करने की परंपरा भी रही है। इसके बाद इन्हीं से स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर परिवार के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं।
घ्यू संक्रांति इस बात का संदेश देती है कि पहाड़ की संस्कृति और लोकपर्व सदियों से प्रकृति, कृषि और पशुधन के साथ जुड़े रहे हैं। बदलते दौर में भी इन परंपराओं को सहेजना हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
समस्त प्रदेशवासियों को घ्यू संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।







