बिरुड़ा पंचमी: परंपरा में छिपा प्रकृति और विज्ञान का संदेश…. विशेष..(राजीव पांडेय )खीमदा “स्टार खबर ” नैनीताल..

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नैनीताल। कुमाऊं की लोकसंस्कृति में हर पर्व अपने साथ प्रकृति, कृषि, स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ा कोई न कोई संदेश लेकर आता है। भाद्रपद मास की बिरुड़ा पंचमी भी ऐसा ही पारंपरिक पर्व है, जिसमें हमारी सदियों पुरानी कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान की झलक दिखाई देती है।
बिरुड़ा पंचमी के अवसर पर घरों में पांच या सात प्रकार के अनाज पानी में भिगोए जाते हैं। इनके साथ दाड़िम की एक छोटी पोटली रखी जाती है, जिसमें दाड़िम, हल्दी, सरसों, दूब और एक सिक्का रखा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हमारी पूर्वजों की प्रकृति और कृषि से गहरी समझ भी दिखाई देती है।
●अंकुरित अनाज में छिपा स्वास्थ्य का संदेश…
अनाज को पानी में भिगोने से उनमें अंकुरण की प्रक्रिया शुरू होती है। अंकुरित होने के दौरान अनाज में कई पोषक तत्व शरीर के लिए अधिक आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं। अंकुरित अनाज में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और विभिन्न जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। यही कारण है कि आज आधुनिक पोषण विज्ञान भी अंकुरित अनाज को संतुलित आहार का उपयोगी हिस्सा मानता है।
कुमाऊं की परंपरा में इन अनाजों को भिगोकर और अंकुरित कर भोजन में शामिल करने की परंपरा इस बात का उदाहरण है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के चक्र और भोजन के स्वास्थ्य संबंधी गुणों को अनुभव के आधार पर समझा था।
●हर पर्व में प्रकृति से जुड़ा संदेश….
कुमाऊं में मनाए जाने वाले अनेक त्योहार सीधे तौर पर खेती-बाड़ी, ऋतु परिवर्तन, वर्षा, जल, वनस्पति और पशुधन से जुड़े हैं। पर्वों के माध्यम से नई पीढ़ी को प्रकृति और कृषि से जोड़ने का काम भी होता रहा है।
बिरुड़ा पंचमी इसी परंपरा की एक सुंदर कड़ी है। इसमें उपयोग होने वाले अनाज हमें कृषि की याद दिलाते हैं, दूब हरियाली और जीवन का प्रतीक है, जबकि हल्दी और सरसों जैसी वस्तुएं ग्रामीण जीवन और प्राकृतिक संसाधनों से हमारा संबंध दर्शाती हैं।
आज जब आधुनिक जीवनशैली में पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है, ऐसे पर्व हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी लोकपरंपराएं केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के अनुभवों से बनी ज्ञान की विरासत भी हैं।
बिरुड़ा पंचमी हमें अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी कृषि संस्कृति से जुड़ने का संदेश देती है। जरूरत है कि इन परंपराओं को केवल रस्म के रूप में नहीं, बल्कि इनके पीछे छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व को समझते हुए अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
बिरुड़ा पंचमी के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाए।