सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी पर चार माह में निर्णय ले सरकार… हाईकोर्ट ने जनहित याचिका निस्तारित कर स्वास्थ्य सचिव को दिए निर्देश… रिपोर्ट- (सुनील भारती) ‘स्टार खबर’ नैनीताल

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नैनीताल। उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जुड़ी जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सचिव को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए स्वास्थ्य सचिव को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की ओर से उनके कार्यालय में लंबित प्रत्यावेदन पर चार माह के भीतर निर्णय लें। साथ ही प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी दूर करने के लिए उचित कदम उठाएं।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। डॉक्टरों के रिक्त पदों को वॉक-इन इंटरव्यू के माध्यम से भरने की प्रक्रिया भी चल रही है। सरकार ने दावा किया कि मार्च तक अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर कर ली जाएगी।

हरिद्वार के नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के पद स्वीकृत होने के बावजूद तैनाती नहीं की गई है। इसके अलावा अस्पतालों में मरीजों के उपचार के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से वर्ष 2025-26 के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि सरकारी अस्पतालों से छोटी-बड़ी बीमारियों से पीड़ित करीब 52 हजार मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्रों (हायर सेंटर) के लिए रेफर करना पड़ा। इसे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियों का उदाहरण बताते हुए कहा गया कि स्थानीय स्तर पर समुचित उपचार की सुविधा नहीं मिलने से मरीजों को दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।

डीडीहाट में टॉर्च की रोशनी में जांच का मामला उठाया

याचिका में पिथौरागढ़ जिले के डीडीहाट स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, अस्पताल में बिजली की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों की जांच तक टॉर्च की रोशनी में करनी पड़ रही है। इससे सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर सवाल उठाए गए।
अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए लंबित प्रत्यावेदन पर चार माह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अब स्वास्थ्य विभाग को अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों पर उचित निर्णय लेना होगा।