नैनीताल।
नैनीताल और चंपावत वन प्रभागों के वन कर्मचारियों के लिए रेडियो टेलीमेट्री तकनीक पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला एवं प्रदर्शन सत्र का आयोजन मंगलवार को किया गया। इस कार्यशाला में लगभग 50 सेवारत कर्मचारियों ने भाग लेकर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी हासिल की।
अखिल भारतीय बाघ सर्वेक्षण (AITE) 2022 के अनुसार, नैनीताल और चंपावत वन प्रभागों से सटे पश्चिमी क्षेत्र में 200 से अधिक बाघों की उपस्थिति दर्ज की गई थी। पिछले कुछ वर्षों में नैनीताल वन प्रभाग में मानव-बाघ और तेंदुआ संघर्ष के मामलों में वृद्धि देखी गई है, जिससे इस प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता और भी बढ़ गई है।
कार्यशाला में बताया गया कि रेडियो टेलीमेट्री एक प्रभावी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसके माध्यम से संदिग्ध वन्यजीवों (बाघ, तेंदुआ आदि) की नियमित निगरानी की जा सकती है। इससे न केवल संघर्षग्रस्त जानवरों की पहचान और ट्रैकिंग आसान होती है, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे जानवरों को उपचार और पुनर्वास के लिए सुरक्षित रूप से रेस्क्यू कर बचाव केंद्रों में भेजा जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. मेराज अनवर ने बाघों की पारिस्थितिकी पर विस्तृत व्याख्यान दिया। इसके बाद रेडियो टेलीमेट्री की अवधारणा, उपकरणों, उनके घटकों और विभिन्न उपयोगों पर विशेषज्ञों द्वारा गहन जानकारी दी गई। साथ ही बाघ अनुसंधान और डेटा विश्लेषण में इसके कानूनी और नियामक पहलुओं पर भी चर्चा की गई।प्रशिक्षण सत्र में रेडियो कॉलर, सैटेलाइट टैग, एंटीना और रिसीवर जैसे उपकरणों का फील्ड में उपयोग कर लाइव डेमो भी प्रस्तुत किया गया। विभिन्न स्तनधारी प्रजातियों के लिए रेडियो कॉलर डैशबोर्ड का प्रदर्शन प्रतिभागियों के लिए विशेष आकर्षण रहा।इस अवसर पर डॉ. जी. अरेंद्रन ने वन कर्मचारियों को रेडियो टेलीमेट्री तकनीक की बारीकियों से अवगत कराया और इसके व्यावहारिक उपयोग पर मार्गदर्शन दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और क्षेत्र में सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।







