नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल में स्थानीय कारीगरों की कला पर्यटकों को खूब आकर्षित कर रही है। पेड़ों की जड़ों, सूखी टहनियों, प्राकृतिक लकड़ी और देवदार के शंकुओं से तैयार किए गए आकर्षक हस्तशिल्प इन दिनों सड़क किनारे सजे स्टॉलों की पहचान बन चुके हैं। इन अनूठी कलाकृतियों को पर्यटक स्मृति चिन्ह के रूप में खरीद रहे हैं, जिससे स्थानीय कारीगरों की आजीविका को भी मजबूती मिल रही है।
ज्योलिकोट निवासी ललित साह पिछले 35 वर्षों से हस्तशिल्प निर्माण के कार्य से जुड़े हैं। उनका कहना है कि पहले नैनीताल में पर्यटकों की संख्या सीमित होती थी, लेकिन कैंची धाम की लोकप्रियता बढ़ने के बाद पूरे क्षेत्र में पर्यटन को नया आयाम मिला है। अब वर्षभर पर्यटकों का आवागमन बना रहता है, जिससे हस्तशिल्प व्यवसाय को भी निरंतर लाभ मिल रहा है।
ललित बताते हैं कि इससे पहले उन्होंने 15 वर्षों तक जिलाधिकारी कैंप में नौकरी की, लेकिन वहां अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिला।
इसके बाद उन्होंने पूरी तरह हस्तशिल्प कार्य को अपनाया। उनका कहना है कि इस व्यवसाय में जितनी अधिक मेहनत की जाए, उतना ही बेहतर प्रतिफल मिलता है और आज उनका परिवार इसी कार्य से अपना जीवनयापन कर रहा है।
उन्होंने बताया कि उनका हैंडीक्राफ्ट विभाग में पंजीकरण भी है। उत्तर प्रदेश के समय सरकार की ओर से प्रदर्शनी एवं विपणन के लिए यात्रा व्यय जैसी सुविधाएं मिलती थीं, लेकिन उत्तराखंड गठन के बाद ऐसी सहायता लगभग बंद हो गई है।
सरकार से अपेक्षाओं के बारे में पूछे जाने पर ललित ने कहा कि हस्तशिल्प निर्माण में सबसे बड़ी समस्या कच्चे माल की उपलब्धता है। यदि सरकार प्राकृतिक कच्चे माल के संग्रहण के लिए रॉयल्टी अथवा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराए, तो कारीगर अधिक मात्रा में उत्पाद तैयार कर सकेंगे और इस पारंपरिक कला को नई पहचान मिलेगी।नैनीताल के इन हस्तशिल्प उत्पादों में लकड़ी की सजावटी वस्तुएं, प्राकृतिक आकृतियों वाले शो-पीस, देवदार के शंकुओं से बनी वॉल हैंगिंग और अन्य कलात्मक वस्तुएं शामिल हैं। जंगलों में बेकार पड़ी लकड़ी और वन उत्पादों को आकर्षक कलाकृतियों में बदलने की यह कला न केवल स्थानीय कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाती है, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रही है।
स्थानीय कारीगरों का मानना है कि यदि उन्हें सरकारी स्तर पर पर्याप्त सहयोग, विपणन के अवसर और कच्चे माल की सुगम उपलब्धता मिले, तो उत्तराखंड की यह पारंपरिक हस्तशिल्प कला देश-विदेश में नई पहचान बना सकती है।







