नैनीताल। मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण नैनीताल के नंदा देवी महोत्सव की उन परंपराओं में शामिल है, जिसमें कला, आस्था और लोक संस्कृति एक साथ दिखाई देती है। 124वें नंदा देवी महोत्सव में मंगोली से विधि-विधान से लाए गए कदली वृक्ष से मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं को आकार दिया जा रहा है। यह प्रक्रिया केवल शिल्प का काम नहीं, बल्कि वर्षों से सेवा में जुटे कलाकारों और सहयोगियों के लिए मां की आराधना का माध्यम है।
मूर्ति निर्माण से जुड़ी मेघा बिष्ट बताती हैं कि वह करीब 10 वर्षों से इस सेवा से जुड़ी हैं। उनके लिए यह महज काम नहीं, बल्कि सेवा और आस्था का विषय है।
उन्होंने बताया कि बचपन में केले के पत्तों और कदली वृक्ष के उपयोग को देखने के बाद जब उन्होंने प्रतिमा निर्माण की बारीकियों को करीब से समझा तो उन्हें पता चला कि मां की प्रतिमा को आकार देने के पीछे लंबी परंपरा और विशेष शिल्प कौशल है। उनका कहना है कि आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को जाने और सीखे, यही प्रयास होना चाहिए।
●18-19 साल से सेवा में जुटीं मोनिका…
मूर्ति निर्माण से जुड़ी मोनिका शाह बताती हैं कि उन्हें इस सेवा से जुड़े करीब 18-19 वर्ष हो चुके हैं। उनके लिए मां की सेवा का अवसर मिलना सौभाग्य है। उनका कहना है कि वर्षभर सितंबर आने का इंतजार रहता है। सितंबर आते ही मन अपने आप मां की सेवा के लिए तैयार होने लगता है।
मोनिका के अनुसार प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रंग पर्यावरण अनुकूल होते हैं। इससे महोत्सव की धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी जुड़ता है। प्रतिमा निर्माण के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जब कलाकारों के सामने स्वरूप को लेकर चुनौती होती है, लेकिन वर्षों के अनुभव के साथ काम आगे बढ़ता है। उनका भाव है कि मां का स्वरूप अंततः अपने आप साकार होता है।
●ऐसे तैयार होता है मां का स्वरूप…
नैनीताल की परंपरा में चयनित कदली वृक्ष के तनों को प्रतिमा के मूल ढांचे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद खपच्चियों से चेहरे और शरीर का आकार तैयार किया जाता है। रूई की सहायता से ढांचे को आकार और मजबूती दी जाती है।
कपड़े की परत चढ़ाकर चेहरे की आकृति को अंतिम रूप दिया जाता है। आंख, नाक और कान जैसी मुखाकृतियों को बारीकी से उकेरा जाता है। इसके बाद रंग-रोगन, आभूषण और श्रृंगार के जरिए मां नंदा-सुनंदा का दिव्य स्वरूप सामने आता है।कदली स्तंभों के चयन और पूजन की परंपरा भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विवरणों में भी नैनीताल में नंदा प्रतिमाओं के कदली स्तंभों से बनाए जाने और उनके चयन को विधि-विधान से किए जाने का उल्लेख मिलता है।
●मूर्ति निर्माण के बाद प्राण प्रतिष्ठा..
प्रतिमाओं के निर्माण के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना और प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद मां नंदा-सुनंदा के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। नैनीताल में यह परंपरा धार्मिक अनुष्ठान के साथ स्थानीय कला और शिल्प की पहचान भी बन चुकी है।
मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं के निर्माण में जुटे सेवाभावी लोगों के लिए यह कुछ दिनों का काम नहीं, बल्कि पूरे साल प्रतीक्षा के बाद मिलने वाला अवसर है। कदली वृक्ष से प्रतिमा का आकार लेने से लेकर मां के श्रृंगार और प्रतिष्ठा तक हर चरण में उनके लिए सेवा, परंपरा और आस्था साथ-साथ चलती है।







