नैनीताल। बीडी पांडे जिला चिकित्सालय नैनीताल में 8 मार्च से 14 मार्च तक ग्लूकोमा जागरूकता सप्ताह के अंतर्गत मरीजों की आंखों की विशेष जांच की गई। इस दौरान नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपिका लोहनी ने मरीजों की जांच कर उन्हें ग्लूकोमा बीमारी के प्रति जागरूक किया और इसके बचाव के उपाय बताए।
उन्होंने ने बताया कि पूरे सप्ताह के दौरान करीब 500 लोगों की आंखों की जांच की गई और उन्हें इस बीमारी से होने वाले नुकसान तथा इससे बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी दी गई।
उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा आंखों की एक गंभीर बीमारी है, जिसमें आंख के अंदर का दबाव (आई प्रेशर) बढ़ने से ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) को नुकसान पहुंचता है। यदि समय पर इसका इलाज न कराया जाए तो यह बीमारी स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती है।
उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा के प्रमुख लक्षणों में धीरे-धीरे नजर कम होना, शुरुआत में साइड से दिखाई देना कम होना, सुरंग जैसी दृष्टि हो जाना और आंखों में दर्द या भारीपन शामिल हैं। कई मामलों में मरीज को सिरदर्द, मतली और रोशनी के चारों ओर इंद्रधनुष जैसा दिखाई देना भी महसूस हो सकता है। बीमारी बढ़ने पर व्यक्ति की दृष्टि पूरी तरह समाप्त होने का खतरा रहता है।
डॉ. लोहनी ने बताया कि ग्लूकोमा का उपचार मुख्य रूप से आंख के दबाव को नियंत्रित करने पर आधारित होता है। इसके लिए मरीजों को आंखों में दवा की बूंदें दी जाती हैं, जिन्हें लंबे समय तक या कई बार जीवनभर इस्तेमाल करना पड़ता है। कुछ मामलों में लेजर थेरेपी के माध्यम से आंख के अंदर तरल पदार्थ के बहाव को बेहतर किया जाता है। यदि दवाइयों और लेजर से लाभ नहीं मिलता तो सर्जरी के जरिए आंख का दबाव नियंत्रित किया जाता है।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि 40 वर्ष की आयु के बाद नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए। यदि परिवार में किसी को ग्लूकोमा है तो विशेष सावधानी बरतना जरूरी है। साथ ही डायबिटीज और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना तथा डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का नियमित सेवन करना भी बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि ग्लूकोमा से जो दृष्टि चली जाती है, वह वापस नहीं आती, इसलिए समय पर जांच और इलाज ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।







