विश्व बाघ दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम आज, आधुनिक तकनीक से हो रही बाघों की निगरानी: डीएफओ… रिपोर्ट – (सुनील भारती ) “स्टार खबर” नैनीताल..

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नैनीताल। विश्व बाघ दिवस के अवसर पर नैनीताल चिड़ियाघर में बुधवार को विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान स्थानीय विद्यालयों के छात्र-छात्राएं क्विज, पेंटिंग सहित अन्य प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) आकाश गंगवार ने बताया कि विश्व बाघ दिवस के अवसर पर अधिक से अधिक बच्चों और लोगों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया। इसके लिए क्षेत्र के विद्यालयों को आमंत्रित किया गया है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना (ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन) में नैनीताल वन प्रभाग में एक बाघ दर्ज किया गया था। वर्ष 2026 की बाघ गणना का फील्ड वर्क 15 जून तक पूरा हो चुका है तथा समस्त आंकड़े भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) को भेज दिए गए हैं। रिपोर्ट जारी होने के बाद वर्तमान संख्या स्पष्ट हो सकेगी।

डीएफओ ने कहा कि मानव और बाघ के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के लिए विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में युद्धस्तर पर काम किया है। हाल के संघर्षों के दौरान दो बाघों का सफल रेस्क्यू किया गया। संघर्ष वाले क्षेत्रों की मैपिंग कर कैमरा ट्रैप लगाए गए, सोलर लाइटें स्थापित की गईं तथा जिला प्रशासन के सहयोग से अस्थायी रूप से चारा वितरण की व्यवस्था भी की गई, ताकि लोगों का जंगलों की ओर आवागमन कम हो सके। साथ ही पोस्टर, वीडियो और जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को “लिविंग विद टाइगर्स, लिविंग विद लेपर्ड” की अवधारणा के अनुरूप व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि अब बाघों की गणना पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से कैमरा ट्रैप तकनीक के माध्यम से की जाती है। प्रत्येक ग्रिड में दो कैमरे लगाए जाते हैं, जिससे बाघ के दोनों ओर के स्ट्राइप पैटर्न दर्ज हो जाते हैं। चूंकि प्रत्येक बाघ का स्ट्राइप पैटर्न अलग होता है, इसलिए डुप्लीकेसी की संभावना समाप्त हो जाती है और सटीक आंकड़े प्राप्त होते हैं।

डीएफओ के अनुसार बढ़ती बाघ और मानव आबादी तथा वन क्षेत्र के सिकुड़ने से दोनों के बीच संपर्क बढ़ा है। यही संपर्क कई बार संघर्ष का रूप ले लेता है। इस विषय पर वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन भी जारी है।
उन्होंने बताया कि वन विभाग अब अत्याधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग कर रहा है। पारंपरिक कैमरा ट्रैप के साथ-साथ सिम-आधारित कैमरा ट्रैप का पायलट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है, जिनसे किसी भी गतिविधि की सूचना तत्काल मोबाइल पर प्राप्त हो जाती है। इसके अलावा मोशन सेंसर आधारित सोलर सीसीटीवी कैमरे, अलर्ट सिस्टम, सोलर लाइट, थर्मल ड्रोन तथा थर्मल मोनोक्युलर जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग निगरानी और रेस्क्यू अभियान में किया जा रहा है। इन उपकरणों से विशेषकर रात्रिकालीन निगरानी और वन्यजीवों की गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई करने में काफी मदद मिल रही है।