जयकारों के बीच मां नंदा-सुनंदा को दी विदाई, भावुक हुई सरोवर नगरी नयना देवी मंदिर से निकला भव्य डोला, तल्लीताल से मल्लीताल तक उमड़ा आस्था का सैलाब; बारिश की बूंदों के बीच गूंजते रहे जयक.. यातायात व्यवस्था को लेकर श्रद्धालुओं में नाराजगी.. रिपोर्ट- (सुनील भारती ) “स्टार खबर” नैनीताल

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नैनीताल। आठ दिन तक मां नंदा-सुनंदा की भक्ति में डूबी सरोवर नगरी नैनीताल बुधवार को विदाई की बेला में भावुक हो उठी। श्री नयना देवी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद मां नंदा-सुनंदा का भव्य डोला नगर भ्रमण पर निकला। ढोल-दमाऊ की थाप, छोलिया नृत्य, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और मां के जयकारों के बीच डोले के दर्शन के लिए तल्लीताल से मल्लीताल तक श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। हल्की बारिश के बीच भी आस्था का उत्साह कम नहीं हुआ। श्रद्धालुओं ने बारिश की बूंदों को मां का आशीर्वाद मानते हुए जयकारे लगाए।

मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं को डोले में विराजमान कर श्रद्धालु नगर भ्रमण के लिए निकले। मंदिर परिसर से डोला बाहर निकलते ही पूरा वातावरण ‘जय मां नंदा-सुनंदा’ के जयकारों से गूंज उठा। डोले के आगे ढोल-दमाऊ और छोलिया दल चल रहे थे, जबकि पीछे बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मार्ग में जगह-जगह लोगों ने अक्षेद व पुष्पवर्षा कर मां का स्वागत किया और पूजा-अर्चना की।कुमाऊं की लोकपरंपरा में मां नंदा को बेटी और नंदा-सुनंदा को मायके आने वाली देवी के रूप में देखा जाता है। नंदाष्टमी पर मां के मायके आने से शुरू हुआ उत्सव डोला यात्रा और विदाई के साथ भावुक पड़ाव पर पहुंचा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर उत्साह के साथ मां की विदाई का दर्द भी साफ दिखाई दिया।

श्रद्धालु देवकी बिष्ट ने कहा कि मां के आगमन से पूरा शहर भक्तिमय हो जाता है। आठ दिनों तक जयकारों से सरोवर नगरी गूंजती रहती है। मां की विदाई का क्षण भावुक करने वाला होता है। कामना है कि मां का आशीर्वाद सभी पर बना रहे।

●बारिश की बूंदों को माना शुभ संकेत..

डोला यात्रा के दौरान हुई बारिश श्रद्धालुओं के उत्साह को कम नहीं कर सकी।
कान्हा साह ने कहा कि मां का डोला उठने के साथ बारिश की बूंदों का गिरना शुभ संकेत है। उन्होंने इसे मां की प्रसन्नता से जोड़ते हुए नैनीतालवासियों को नंदा देवी महोत्सव की बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस बार बड़ी संख्या में लोगों ने मेले में सहभागिता की।

●यातायात व्यवस्था से श्रद्धालु रहे परेशान…

डोला यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के बावजूद यातायात व्यवस्था को लेकर कई लोगों में नाराजगी भी दिखाई दी। नगर के प्रमुख मार्गों पर भीड़ बढ़ने के साथ यातायात संचालन प्रभावित हुआ। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं और वाहनों की आवाजाही को लेकर अव्यवस्था की स्थिति बनी रही। लोगों का कहना था कि डोला यात्रा के दौरान भीड़ के अनुरूप यातायात व्यवस्था और बेहतर की जानी चाहिए थी। श्रद्धालुओं को कई जगह आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ा।

 

मां की विदाई में शामिल होने पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय लोगों ने भी सेवा भाव का परिचय दिया। नगर में जगह-जगह स्थानीय लोगों और विभिन्न संगठनों की ओर से जलपान की व्यवस्था की गई। श्रद्धालुओं को पानी, चाय और अन्य खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई गई। डोला यात्रा के मार्ग में लोगों ने श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए सेवा की। स्थानीय लोगों का कहना था कि मां की सेवा और श्रद्धालुओं की सेवा को वह अपना सौभाग्य मानते है।

मां नंदा-सुनंदा के डोले में धार्मिक आस्था के साथ कुमाऊं की लोक संस्कृति के विविध रंग भी दिखाई दिए। ढोल-दमाऊ की थाप, छोलिया नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों की प्रस्तुति ने माहौल को विशेष बना दिया। नगर के बाजारों, घरों और मार्गों पर लोग मां के दर्शन के लिए खड़े रहे।पूर्व विधायक नारायण सिंह जंतवाल ने कहा कि मां की स्थापना के साथ ही पूरे शहर में हर्षोल्लास और लोक संस्कृति की धूम रहती है। विदाई का क्षण हमेशा भावुक कर देता है। मां की कृपा नैनीताल और पूरे प्रदेश पर बनी रहेउन्होंने महोत्सव के सफल आयोजन के लिए आयोजन समिति और इससे जुड़े सभी लोगों को साधुवाद दिया।

 

 

डोला यात्रा के दौरान भवाली और भीमताल में भी अपने-अपने धार्मिक आयोजनों को लेकर लोगों में उत्साह रहा। श्रद्धालुओं का कहना था कि प्रत्येक स्थान की अपनी धार्मिक मान्यता और परंपरा है। जो श्रद्धालु नैनीताल नहीं पहुंच सके, उन्होंने अपने क्षेत्र के आयोजन में शामिल होकर मां का आशीर्वाद लिया।

विसर्जन के साथ 124वें महोत्सव का समापन

नगर भ्रमण के बाद मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का विधि-विधान से विसर्जन किया गया। इसके साथ ही श्री नंदा देवी महोत्सव का आठ दिवसीय आयोजन संपन्न हो गया। कदली वृक्षों के चयन और पूजा से शुरू हुई परंपरागत प्रक्रिया, प्रतिमा निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा, दर्शन और फिर डोला भ्रमण व विसर्जन तक पूरा आयोजन कुमाऊं की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बना रहा।

मां की विदाई के बाद नगर धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या में लौट आएगा, लेकिन आठ दिनों तक गूंजते रहे जयकारे, ढोल-दमाऊ की थाप और मां को बेटी के रूप में विदा करने की भावुक परंपरा नैनीतालवासियों की स्मृतियों में लंबे समय तक बनी रहेगी।