कुमाऊं विवि के प्रो. बर्गली विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों में.. पारिस्थितिकी के क्षेत्र में मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान… रिपोर्ट- (सुनील भारती) “स्टार खबर ” नैनीताल..

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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं पर्यावरण विज्ञान निदेशक प्रो. सुरेंद्र सिंह बर्गली ने विश्वविद्यालय और कुमाऊं हिमालय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। पारिस्थितिकी के क्षेत्र में उनके शोध योगदान को वर्ष 2025-26 के लिए विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में स्थान मिला है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और एल्सेवियर से संबद्ध आंकड़ों के आधार पर जारी मान्यता प्रमाणपत्र में उन्हें वैश्विक स्तर पर 94,796वीं रैंक तथा पारिस्थितिकी उपक्षेत्र में 1,789वां स्थान मिला है।
प्रो. बर्गली का शोध मुख्य रूप से हिमालयी पारिस्थितिकी, वन प्रबंधन, जैव विविधता, आक्रामक पादप प्रजातियों और समुदाय आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर केंद्रित रहा है। उनके नाम 250 से अधिक सहकर्मी-समीक्षित शोधपत्र, पुस्तक अध्याय और संपादकीय दर्ज हैं। उनकी शोध प्रोफाइल में 7,814 उद्धरण तथा 50 का एच-इंडेक्स दर्ज है।

●हिमालयी पारिस्थितिकी पर विशेष फोकस..

प्रो. बर्गली ने कुमाऊं हिमालय के वन एवं पादप समुदायों से जुड़े विषयों पर लंबे समय से अध्ययन किया है। उनके शोध में वनस्पति विविधता, वन कार्बन एवं जैवभार, घासभूमि, मृदा प्रक्रियाओं, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों जैसे विषय शामिल हैं। उनके शोध कार्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
आक्रामक पादप प्रजातियां भी उनके शोध का प्रमुख विषय रही हैं। एगेरेटिना एडेनोफोरा जैसे खरपतवारों के प्रसार, वृद्धि रणनीतियों और अलग-अलग आवासों में इनके प्रभावों का उन्होंने अध्ययन किया है। इसके साथ ही तापमान व जल संकट का बीज अंकुरण, ऊंचाई के साथ वनस्पतियों के अनुकूलन तथा हिमालयी घासभूमियों की संरचना में बदलाव जैसे विषयों पर भी शोध किया गया है।
प्रो. बर्गली के शोध का एक महत्वपूर्ण पक्ष आक्रामक वनस्पतियों के उपयोग की संभावनाओं से जुड़ा है। क्रॉफ्टन खरपतवार के नाम से पहचानी जाने वाली एगेरेटिना एडेनोफोरा से जैवचार तैयार करने तथा उसके कृषि उपयोग की संभावनाओं पर अध्ययन किया गया है। इसमें ताप-अपघटन की परिस्थितियों का जैवचार के गुणों पर प्रभाव भी जांचा गया। आक्रामक पौधों के जैवभार को मृदा सुधारक के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर भी उनके शोध में जोर दिया गया है।
उनके अध्ययन वन पारिस्थितिकी, मृदा विज्ञान, पादप जीवविज्ञान और पर्यावरण विज्ञान के बीच संबंधों को भी सामने लाते हैं। वन कार्बन भंडारण और जैवभार से जुड़े शोध जलवायु परिवर्तन के दौर में विशेष महत्व रखते हैं।

●पेटेंट सहित कई उपलब्धियां..

हिमालयी पादप संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के क्षेत्र में भी प्रो. बर्गली का योगदान रहा है। हिमालयी पौधे एलियम स्ट्रैचेयी के इन-विट्रो सूक्ष्मप्रवर्धन से संबंधित विधि का पेटेंट भी उनकी शोध प्रोफाइल में दर्ज है।शोध के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2022 में राष्ट्रीय पारिस्थितिकी संस्थान (एनआईई) की ओर से उत्कृष्टता प्रमाणपत्र प्रदान किया गया। इसी वर्ष 10 से अधिक शोध प्रभाव-कारक प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रो. केएस वाल्दिया शोध पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कुमाऊं विश्वविद्यालय की ओर से वर्ष 2024 और 2025 में शोध, शिक्षण एवं शैक्षणिक नेतृत्व में योगदान के लिए उन्हें उत्कृष्ट संकाय पुरस्कार भी मिला।विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों में स्थान मिलना प्रो. बर्गली के साथ ही कुमाऊं विश्वविद्यालय के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पहचान हिमालयी वनों, मृदा, पादप विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े उनके दीर्घकालिक शोध की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को दर्शाती है।